Skip to main content

Posts

Showing posts from April, 2026

चमक, चेहरे और चराचर

  (एक आत्मिक विमर्श) आज के इस भागदौड़ भरे युग में, जहाँ हर चीज़ की सतह को चमकाने की होड़ मची है, मन अक्सर उन सूक्ष्म परिभाषाओं में उलझ जाता है जिन्हें हम सामान्य बोलचाल में एक ही समझ बैठते हैं। एक विचारक की दृष्टि जब समाज की आदतों को देखती है, तो उसे ‘सफ़ाई’, ‘स्वच्छता’, ‘निर्मलता’ और ‘शुचिता’ के बीच एक मीलों लंबा फासला नज़र आता है। सफ़ाई तो एक सतही कर्म है, जिसे हम प्रतिदिन के कार्यों में गिनते हैं। यह हाथों का वह श्रम है जो धूल और कचरे को एक स्थान से हटाकर दूसरे स्थान पर डाल देता है। सफ़ाई से वस्तु आँखों को तो सुहाती है, किंतु वह उसके अस्तित्व के भीतर नहीं उतरती। यह वैसा ही है जैसे किसी पुराने भवन की बाहरी दीवार पर रंग-रोगन कर दिया जाए, जबकि उसकी नींव में समय की सीलन आज भी मौजूद हो। समाज आज इसी बाहरी सफ़ाई का दीवाना है, जहाँ मुखौटे तो साफ़ हैं, पर उनके पीछे के चेहरे वक्त और विकारों की धूल से धुंधले पड़ चुके हैं। जब हम सफ़ाई से ऊपर उठकर ‘स्वच्छता’ की बात करते हैं, तो हम एक व्यवस्था और संस्कार की बात कर रहे होते हैं। स्वच्छता केवल गंदगी का अभाव नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और सुरक्षा का व...

रूह का निखार- ‘अनपढ़’ की कलम से एक विचार

‘ अनपढ़’ की कलम से एक विचार, उनकी अपनी सोच है यह रचना बाहरी और आंतरिक जीवन के अंतर को बहुत सरल लेकिन गहरे प्रतीक के माध्यम से समझाती है। बर्तनों की सफ़ाई से उनकी चमक तो बढ़ती है, पर धातु धीरे-धीरे घिसती जाती है, जो यह दर्शाता है कि बाहरी सजावट में कहीं न कहीं क्षरण छिपा होता है। इसके विपरीत, जब मन की शुचिता बढ़ती है, तो जीवन का भार हल्का लगने लगता है और व्यक्ति भीतर से सहज एवं शांत अनुभव करता है। दुनिया जिस “जवानी” को देखकर दाद देती है, वह प्रायः केवल बाहरी आकर्षण और ऊर्जा तक सीमित होती है। जबकि कवि के अनुसार वास्तविक जवानी आत्मा की अवस्था है जब रूह अपने असल और पवित्र स्वरूप में प्रकट होती है। यही आंतरिक जागृति जीवन की सच्ची सुंदरता और स्थायी संतुलन का आधार बनती है।

अंतरद्वंद्व की अनुगूंज

  अंतरद्वंद्व की अनुगूंज ( मार्मिक कविता)  क्यों रुष्ट है,यह भी स्पष्ट नहीं अपने ही मन से कैसा वैर, ज्ञात नहीं, अनपढ़ को अपने भावों का बोध नहीं। क्या हुआ, कब हुआ स्मरण नहीं, किसने कहा इसका भी ज्ञान नहीं, निराधार आरोप लिए बैठा है 'अनपढ़'।   मन की चंचल तरंगें उठीं, स्वयं से ही रुष्ट हो बैठा अनपढ़, अन्यथा इसका कोई कारण नहीं। रूप से दूरी बना ली है, पर स्वभाव पर विश्वास शेष है, स्नेह में कोई न्यूनता नहीं। अधरों पर थी केवल शुभकामना, हृदय की उलझन में वह बदल गई, कब अभिशाप बनी यह ज्ञात नहीं। सोचा अब कोई अपना नहीं, संबंध भी तोड़ दिए अनपढ़ ने, किन्तु कारण अब तक स्पष्ट नहीं। अनपढ़ स्वार्थी है, दोषपूर्ण भी, उसकी वेदना से अनजान है संसार, उसके मन का कोई साक्षी नहीं। जीवन और मृत्यु के मध्य खड़ा 'अनपढ़', निर्णय अब तक अधूरा है, न जीवन से अनुराग, न मृत्यु से संबंध। — अखिलेश जोशी “अनपढ़”

The Historic Alumni Meet of "Central School (KV) Indore"- First Batch

The Historic Alumni Meet of "Central School (KV) Indore" - Maheshwar February 2025 The Central School (KV) Indore Alumni Meet, held in the timeless and regal setting of Maheshwar in February 2025, was far more than a simple gathering; it was a nostalgic odyssey back to the roots of shared childhoods and lifelong friendships. Set against the majestic silhouette of Ahilya Fort and the ethereal banks of the Narmada River, the event unfolded as a perfect harmony of cultural heritage and heartwarming reconnections. Organization and Distinguished Attendance This grand reunion was meticulously envisioned and organized by Rajendra and Vinay, whose primary goal was to create an intimate retreat away from the city's frantic pace. The meet witnessed an unprecedented turnout, most notably featuring the pioneer batch of 1964-65. The gathering included more than ten couples, along with individual alumni and their families. The presence of spouses added a warm, familial dime...

कम लोग: गहरे रिश्ते- बुज़ुर्गावस्था की सच्चाई

कम लोग: गहरे रिश्ते- बुज़ुर्गावस्था की सच्चाई बुजुर्गों के लिए जीवन का उत्तरार्ध केवल विश्राम का समय नहीं, बल्कि संबंधों को संवारने और विस्तार देने का भी एक महत्वपूर्ण अवसर होता है। “शुभचिंतकों की संख्या बढ़ाना” का अर्थ केवल अधिक लोगों से मिलना नहीं, बल्कि ऐसे लोगों से जुड़ना है जो सच्चे मन से उनकी भलाई चाहें, उनका सम्मान करें और भावनात्मक सहारा बन सकें। उम्र बढ़ने के साथ कई पुराने रिश्ते स्वाभाविक रूप से दूर हो जाते हैं, ऐसे में नए सकारात्मक संबंध जीवन में ताजगी और सुरक्षा का एहसास देते हैं। इस विचार को थोड़ा और गहराई से समझें तो स्पष्ट होता है कि बुजुर्गावस्था में “शुभचिंतक” केवल सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता का आधार बन जाते हैं। इस उम्र में व्यक्ति के पास अनुभवों का अपार भंडार होता है, परंतु यदि उन्हें साझा करने वाला या सुनने वाला कोई न हो, तो वही अनुभव भीतर ही भीतर बोझ बन सकते हैं। ऐसे में शुभचिंतकों का बढ़ता दायरा उन अनुभवों को अर्थ देता है, उन्हें मान्यता और सम्मान प्रदान करता है। इस उम्र में शुभचिंतक मानसिक और सामाजिक संबल बन जाते हैं। वे अकेलेपन को कम करते हैं, स...

श्रद्धांजलि - आशा भोंसले

MillenniuM INFRA: भरोसे की नींव, भविष्य का निर्माण

Indore की तेज़ी से विकसित होती धरा पर एक स्वप्न धीरे-धीरे साकार हो रहा था… यह स्वप्न केवल कंक्रीट की संरचनाएँ खड़ी करने का नहीं, बल्कि अटूट विश्वास की नींव पर एक नई दुनिया बसाने का था। इस संकल्प का नाम है — Millennium Infra । शुरुआत संक्षिप्त थी—सीमित संसाधन और कुछ समर्पित हाथ, परंतु सोच अत्यंत स्पष्ट थी: “घर सिर्फ चार दीवारें नहीं, बल्कि मनुष्य के सपनों का आधार होता है।” समय के साथ, इसी दूरदर्शिता ने व्यवस्थित प्लॉट्स (Planned Plots) और सुनियोजित कॉलोनियों का रूप लिया। ये ऐसे प्रोजेक्ट्स बने जहाँ लोग केवल पूंजी का निवेश नहीं करते, बल्कि अपने सुरक्षित भविष्य की कल्पना करते हैं। धीरे-धीरे, ज़मीन के निर्जन टुकड़े एक "पहचान" और "पते" में तब्दील होने लगे—जहाँ अब बच्चों की खिलखिलाहट गूंजती है, जहाँ शाम की हवाओं में सुकून का वास है, और जहाँ हर प्लॉट एक नई सफलता की कहानी कहता है। Millennium Infra ने केवल निर्माण नहीं किया, बल्कि रिश्तों और भरोसे का एक अटूट सिलसिला खड़ा किया है। आज यहाँ ज़मीन बेची नहीं जाती, बल्कि खुशहाल कल की नींव रखी जाती है। MillenniuM   ICON      ...

LEADERSHIP- anpadh

LEADERSHIP “He may possess courage and powers like a Lion but without plans A leader is like a Donkey”- anpadh

सत्य का ठेकेदार - अनपढ़ की कविताएँ

जो मैं चाहूँ वही हो कायदे कानून सब झुक जाएँ सूरज भी मेरी मर्ज़ी से उगे चाँद भी मेरी हाँ में हाँ मिलाए दुनिया बस मेरे इशारों पर चल जाए जो मैं कहूँ वही सही तर्क मेरे आगे सिर झुकाएँ किताबें कोनों में धूल खाएँ मेरी ज़ुबान ही वेद बन जाए बाकी सब ज्ञान व्यर्थ कहलाए मैं कहूँ वही हो इतिहास भी मुझसे लिखवाया जाए कल का झूठ आज सच बन जाए मेरे शब्द ही समय कहलाएँ सच भी मुझसे अनुमति पाए जो मैंने सीखा वही सही बाकी सब मूर्ख करार दिए जाएँ डिग्रियाँ अनुभव सब व्यर्थ ठहरें मैं अनपढ़ होकर भी ज्ञानी कहलाऊँ मेरा अज्ञान ही सम्मान पाए कुछ सीखा नहीं वो मिथ्या जो समझ न आया वो झूठ ठहरे मेरी सीमा ही सत्य बन जाए अज्ञान को ही ज्ञान बताया जाए और मैं स्वयं विद्वान कहलाऊँ मैंने सुना तो सही ही है अफवाहें भी प्रमाण बन जाएँ जाँच पड़ताल सब व्यर्थ ठहरे मेरे कान ही अदालत बन जाएँ हर सुनी बात सत्य कहलाए बाकी सब पूर्णतः ग़लत है यही मेरा अंतिम विचार रहे मैं ही प्रमाण मैं ही विधान मैं ही प्रश्न मैं ही उत्तर बनूँ सत्य भी मुझसे छोटा पड़े कोई टोक दे अगर मुझको उसे तुरंत अज्ञानी कह दूँ भीड़ जुटाकर शोर मचा दूँ सच को भी कटघरे में खड़ा कर द...