(एक आत्मिक विमर्श) आज के इस भागदौड़ भरे युग में, जहाँ हर चीज़ की सतह को चमकाने की होड़ मची है, मन अक्सर उन सूक्ष्म परिभाषाओं में उलझ जाता है जिन्हें हम सामान्य बोलचाल में एक ही समझ बैठते हैं। एक विचारक की दृष्टि जब समाज की आदतों को देखती है, तो उसे ‘सफ़ाई’, ‘स्वच्छता’, ‘निर्मलता’ और ‘शुचिता’ के बीच एक मीलों लंबा फासला नज़र आता है। सफ़ाई तो एक सतही कर्म है, जिसे हम प्रतिदिन के कार्यों में गिनते हैं। यह हाथों का वह श्रम है जो धूल और कचरे को एक स्थान से हटाकर दूसरे स्थान पर डाल देता है। सफ़ाई से वस्तु आँखों को तो सुहाती है, किंतु वह उसके अस्तित्व के भीतर नहीं उतरती। यह वैसा ही है जैसे किसी पुराने भवन की बाहरी दीवार पर रंग-रोगन कर दिया जाए, जबकि उसकी नींव में समय की सीलन आज भी मौजूद हो। समाज आज इसी बाहरी सफ़ाई का दीवाना है, जहाँ मुखौटे तो साफ़ हैं, पर उनके पीछे के चेहरे वक्त और विकारों की धूल से धुंधले पड़ चुके हैं। जब हम सफ़ाई से ऊपर उठकर ‘स्वच्छता’ की बात करते हैं, तो हम एक व्यवस्था और संस्कार की बात कर रहे होते हैं। स्वच्छता केवल गंदगी का अभाव नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और सुरक्षा का व...
यह ब्लॉग साहित्य, संस्मरण, व्यंग्य, कविता, सामाजिक चिंतन और सांस्कृतिक विरासत का संग्रह है। यहाँ अखिलेश जोशी ‘अनपढ़’ की मौलिक रचनाओं के साथ-साथ उनके पितामह, स्वर्गीय श्रीकृष्ण जोशी ‘नक़्शे नवीस’ की दुर्लभ एवं अप्रकाशित साहित्यिक कृतियाँ भी प्रस्तुत हैं। यह मंच अतीत और वर्तमान के संवाद, जीवनानुभवों, मानवीय मूल्यों तथा भारतीय सांस्कृतिक चेतना को संरक्षित और साझा करने का एक विनम्र प्रयास है।