स्वस्थ रहने के लिये, बीमार होना ज़रूरी है। यदि आप बीमार नहीं पड़े, तो आपकी समाज में पूछ-परख घटने की सम्भावना है। किसी फ़ंक्शन या पार्टी में आप आकर्षण का केंद्र नहीं बनेंगे। लोग आपसे पूछेंगे ही नहीं— “अब आप कैसे हैं?” “अमुक ने बताया था कि आप बीमार थे!” “क्या हो गया था आपको?” “ख़ैर, अब ध्यान रखना।” यदि आप बीमार नहीं पड़े, तो ये सब कोई नहीं पूछेगा। इसलिए बीमार होना ज़रूरी है।। “कुछ खाया कि नहीं?” “ये मत खाया कीजिए।” “आप तो ये लीजिए।” “अच्छे डॉक्टर को दिखाना ज़रूर।” और फिर शुरू होता है ज्ञान-विस्तार का महायज्ञ— “पता नहीं आजकल कैसी-कैसी बीमारियाँ हो रही हैं! हमारे पड़ोसी का भाई... अरे, उम्र भी अपने छोटे बेटे जितनी थी। रात को सिर दर्द हुआ। डॉक्टर को दिखाया। फिर बड़े डॉक्टर को भी दिखाया। MRI कराया। X-ray निकलवाया। पन्द्रह-बीस बोतलें चढ़ीं। पर फ़ायदा नहीं हुआ...” शादी-पार्टियों में खाते ही कितना हैं? दो-तीन सौ ग्राम। पर तीन घंटे कैसे बीतते, यदि आप बीमार न होते? इसलिए समय काटने के लिये भी बीमार होना ज़रूरी है।। फिर कुछ शुभचिंतक मिलेंगे— “आप कभी हमारे घर आइए। आपको हमारे मित्र डॉक्टर...
यह ब्लॉग साहित्य, संस्मरण, व्यंग्य, कविता, सामाजिक चिंतन और सांस्कृतिक विरासत का संग्रह है। यहाँ अखिलेश जोशी ‘अनपढ़’ की मौलिक रचनाओं के साथ-साथ उनके पितामह, स्वर्गीय श्रीकृष्ण जोशी ‘नक़्शे नवीस’ की दुर्लभ एवं अप्रकाशित साहित्यिक कृतियाँ भी प्रस्तुत हैं। यह मंच अतीत और वर्तमान के संवाद, जीवनानुभवों, मानवीय मूल्यों तथा भारतीय सांस्कृतिक चेतना को संरक्षित और साझा करने का एक विनम्र प्रयास है।