~~ वर्षा वर्णन ~~ ~ शार्दूल विक्रीडित छंद ~ वासंती ऋतुकाल अंत लखि के आया बली ग्रीष्म है, भूमि पे अति उग्र पावक बढ़ा रूखे हुवे रुख है | सूखे झील नदी न शीत मिलती लू की लगी वायु है, प्राणी जीव चराचरादी तड़पें हा ईश क्या दुःख है || पंखे की लपटें लगे गरम हैं, पानी नहीं शीत है, राजा तो गिरिश्र्नगपे चल बसें, पै दीं बेठोर है | होता है न उपाय शीतारिपू का, प्रस्वेद जारी रहे, है आराम न एक भी पल कहीं, हा नाक में प्राण है || हो उन्मत्त निदाध निर्दय भाया, संसार संतापदा, तापे पावस भूप संग ले आए हरी आपदा | भारी भीर भई भिरी दुहु अनी गर्मी भागी शीत से, हारा ग्रीषम प्राण ले निज भगा जैसे निशा सूर्य से || वर्षा ग्रीषम युद्ध बीच नभ में आये महा मेघ हैं, जैसे शूर अनेक शास्त्र सजी के युद्धार्थ एकत्र हैं | विद्युच्छक्ति अनेक बार लपके आकाश शोभा लहे, बूंदों के शर शीत चंचल चले पानी क्षितीपे बहे || बाढ़ें मेघ गिरीश तुल्य कबहु गरजे डरावे कभी, आभा को चमकात खूब बिजली आँखे मिचावें कभी | वर्षा की जय हार होत कबहु ग्रीष्माहू जीते हरे, वर्षा से सुख शीत होत ग्रीष्माहू क...
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