हमारा बेटा बहुत होशियार है।
उसके सिर पर बड़ा आदमी
बनने का भूत सवार है,
हमारा बेटा बहुत होशियार है।
हमने भी सोच लिया है,
उसे मुकेश या अनिल बनाएँगे,
और स्वयं धीरू कहलाएँगे।
मेरी सुनता भी बहुत है,
माँ से उसे बेहद प्यार है,
हमारा बेटा बहुत होशियार है।
साइकिल लाकर दी थी उसको,
अब मोटर साइकिल की हठ है।
देना तो है, माँ भी कहती—
“अरे! इसमें भला क्या कठिनाई है?”
उसके कितने मित्रों के पास है,
कोई बड़ी माँग थोड़े ही है।
मैं भी सोचता हूँ-
बेटा तो बड़ा होनहार है,
हमारा बेटा बहुत होशियार है।
मोबाइल पर फ़ेसबुक, व्हाट्सऐप
और न जाने क्या-क्या कर लेता है।
कपड़ों की पसंद भी ऐसी कि
हर कोई देखकर दंग रह जाता है।
हमारे ज़माने में पिता जी
माँगने पर जूता दिखाते थे,
पर अब समय बदल गया है,
और यही आधुनिकता का सार है।
हमारा बेटा बहुत होशियार है।
वैसे होटल का आदी नहीं,
पर मित्रों से प्रेम बहुत करता है।
जब भी जाता है,
दो-चार साथियों को साथ ले जाता है।
आकर हमें नई-नई डिशों के
नाम बड़े गर्व से बताता है।
पैसों के लिए मम्मी को
पल भर में मना लेता है।
शायद यही नई पीढ़ी के
लोक-संस्कार हैं,
हमारा बेटा बहुत होशियार है।
पिछले संडे अजीब-सी गंध आई थी,
उसकी माँ ने बताया—
“बेटे की कोई मित्र आई थी।”
जाता तो नहीं था,
पर बहुत समझाने पर गया।
साथियों ने कोई आयोजन किया था,
वहीं उसे भी बुलाया था।
कहते हैं-
‘कॉकटेल’ बड़े लोगों का रिवाज़ है,
हमारा बेटा बहुत होशियार है।
दसवीं में पचास प्रतिशत मिले,
तो कुछ देर उदास हुआ।
माँ ने तुरंत समझाया—
“कम मिले तो क्या हुआ?
आगे अच्छे से पढ़ लेना।
फिर पापा की तनख़्वाह भी
पचास हज़ार है।
तू चिंता मत कर बेटा,
जो कर रहा है वही कर।
इंजीनियरिंग की फ़ीस के लिए
तेरा पापा तैयार है।”
हमारा बेटा बहुत होशियार है।
अब तो माँ से जेब ख़र्च भी
कम लेने लगा है,
फिर भी सज-सँवर कर
रहने लगा है।
कई पुस्तकें छुप-छुपकर
पढ़ने लगा है,
मोटर साइकिल घर पर छोड़कर
मित्रों की महँगी कारों में
घूमने लगा है।
लगता है बड़े आदमी बनने की
भूमिका तैयार है,
हमारा बेटा बहुत होशियार है।
अचानक एक दिन घर पर
पुलिस आ पहुँची।
साथ में वारंट था,
और हथकड़ी भी लाई थी।
मैं धक-सा रह गया,
उसकी माँ भी घबराई थी।
पूरा घर छान मारा गया,
और बेटे के तकिए में
एक नहीं, दो नहीं,
ड्रग्स की सौ पुड़िया पाई थीं।
बहुत सोचा—
क्या यही हमने संस्कार दिए थे?
फिर भी मन कहता रहा—
हमारा बेटा बहुत होशियार है।
माँ रोने लगी,
छाती पीटने लगी।
पश्चात्ताप की अग्नि में
धीरे-धीरे जलने लगी।
जिसका पक्ष लिया उम्र भर,
आज उसी से हार गई।
अपनी ही परवरिश पर
प्रश्नचिह्न लगा बैठी।
मैंने बेटे से पूछा—
“तूने ऐसा क्यों किया?”
वह बोला—
“ऊँची उड़ानों से पहले
गिरना भी एक रिवाज़ है।
बड़े आदमी बनने की राह में
सब कुछ जायज़ है।”
सुनकर लगा—
शायद गलती उसकी कम,
हमारी ज़्यादा थी।
उसके सिर पर बड़ा आदमी
बनने का भूत सवार था।
हम दौलत को सफलता समझते रहे,
यही हमारी सबसे बड़ी हार थी।
अब सोचता हूँ—
सुविधाएँ तो खूब दीं,
पर संस्कार उधार रहे।
सपनों को तो पंख दिए,
पर चरित्र लाचार रहे।
फिर भी दुनिया से कहते फिरते हैं
“हमारा बेटा बहुत होशियार है…”
“हमारा बेटा बहुत होशियार है…”
— अखिलेश जोशी ‘अनपढ़’
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