जो मैं चाहूँ वही हो
कायदे कानून सब झुक जाएँ
सूरज भी मेरी मर्ज़ी से उगे
चाँद भी मेरी हाँ में हाँ मिलाए
दुनिया बस मेरे इशारों पर चल जाए
जो मैं कहूँ वही सही
तर्क मेरे आगे सिर झुकाएँ
किताबें कोनों में धूल खाएँ
मेरी ज़ुबान ही वेद बन जाए
बाकी सब ज्ञान व्यर्थ कहलाए
मैं कहूँ वही हो
इतिहास भी मुझसे लिखवाया जाए
कल का झूठ आज सच बन जाए
मेरे शब्द ही समय कहलाएँ
सच भी मुझसे अनुमति पाए
जो मैंने सीखा वही सही
बाकी सब मूर्ख करार दिए जाएँ
डिग्रियाँ अनुभव सब व्यर्थ ठहरें
मैं अनपढ़ होकर भी ज्ञानी कहलाऊँ
मेरा अज्ञान ही सम्मान पाए
कुछ सीखा नहीं वो मिथ्या
जो समझ न आया वो झूठ ठहरे
मेरी सीमा ही सत्य बन जाए
अज्ञान को ही ज्ञान बताया जाए
और मैं स्वयं विद्वान कहलाऊँ
मैंने सुना तो सही ही है
अफवाहें भी प्रमाण बन जाएँ
जाँच पड़ताल सब व्यर्थ ठहरे
मेरे कान ही अदालत बन जाएँ
हर सुनी बात सत्य कहलाए
बाकी सब पूर्णतः ग़लत है
यही मेरा अंतिम विचार रहे
मैं ही प्रमाण मैं ही विधान
मैं ही प्रश्न मैं ही उत्तर बनूँ
सत्य भी मुझसे छोटा पड़े
कोई टोक दे अगर मुझको
उसे तुरंत अज्ञानी कह दूँ
भीड़ जुटाकर शोर मचा दूँ
सच को भी कटघरे में खड़ा कर दूँ
और खुद को विजेता कह दूँ
एक दिन आईना सामने आए
चुपचाप मुझको देखता जाए
मेरे ही शब्द मुझसे पूछें
अब किसको तुम सच बतलाओगे
जब खुद से ही नज़रें चुराओगे
फिर भी शायद मैं न बदलूँ
आईने को ही झूठ बता दूँ
अपनी धुन में मग्न रहूँ
सच को फिर से ठुकरा दूँ
क्योंकि अनपढ़ के लिए “मैं” ही बड़ा है।
— अखिलेश जोशी “अनपढ़”

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