(एक आत्मिक विमर्श)
आज के इस भागदौड़ भरे युग में, जहाँ हर चीज़ की सतह को चमकाने की होड़ मची है, मन अक्सर उन सूक्ष्म परिभाषाओं में उलझ जाता है जिन्हें हम सामान्य बोलचाल में एक ही समझ बैठते हैं। एक विचारक की दृष्टि जब समाज की आदतों को देखती है, तो उसे ‘सफ़ाई’, ‘स्वच्छता’, ‘निर्मलता’ और ‘शुचिता’ के बीच एक मीलों लंबा फासला नज़र आता है। सफ़ाई तो एक सतही कर्म है, जिसे हम प्रतिदिन के कार्यों में गिनते हैं। यह हाथों का वह श्रम है जो धूल और कचरे को एक स्थान से हटाकर दूसरे स्थान पर डाल देता है। सफ़ाई से वस्तु आँखों को तो सुहाती है, किंतु वह उसके अस्तित्व के भीतर नहीं उतरती। यह वैसा ही है जैसे किसी पुराने भवन की बाहरी दीवार पर रंग-रोगन कर दिया जाए, जबकि उसकी नींव में समय की सीलन आज भी मौजूद हो। समाज आज इसी बाहरी सफ़ाई का दीवाना है, जहाँ मुखौटे तो साफ़ हैं, पर उनके पीछे के चेहरे वक्त और विकारों की धूल से धुंधले पड़ चुके हैं।
जब हम सफ़ाई से ऊपर उठकर ‘स्वच्छता’ की बात करते हैं, तो हम एक व्यवस्था और संस्कार की बात कर रहे होते हैं। स्वच्छता केवल गंदगी का अभाव नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और सुरक्षा का वह कवच है जो कीटाणुओं और दूषित तत्वों को पनपने से रोकता है। हमारे शहर इंदौर ने जो मिसाल पेश की है, वह केवल कूड़ा बीनने की क्रिया नहीं, बल्कि नागरिकों के स्वभाव में बसी वह स्वच्छता है जो एक स्वस्थ जीवनशैली का मार्ग प्रशस्त करती है। किंतु एक दार्शनिक प्रश्न यहाँ खड़ा होता है—क्या केवल स्वस्थ और साफ़ होना ही पूर्णता है? यहीं से ‘निर्मलता’ का वह मार्ग शुरू होता है, जो वस्तु को उसके ‘मूल रूप’ की ओर ले जाता है। माँ जब पुराने पीतल के बर्तनों को बड़े जतन से राख और खटाई से माँजती थी, तो बर्तन की ऊपरी मटमैली परत उतर जाती थी और वह अपनी उस मूल पीली आभा के साथ दमक उठता था जैसा वह अपनी उत्पत्ति के समय रहा होगा।
अक्सर बुद्धिजीवी यह तर्क देते हैं कि इस घिसाई से बर्तन का वजन कम हुआ है, उसकी धातु का क्षरण हुआ है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह सत्य हो सकता है, पर आध्यात्मिक दृष्टि से यह ‘क्षरण’ नहीं बल्कि ‘मुक्ति’ है। यह उस ‘तूतिया’ और ऑक्सीडेशन से मुक्ति है जिसने धातु के असली स्वभाव को वर्षों से दबा रखा था। ठीक यही प्रक्रिया मनुष्य के व्यक्तित्व पर भी लागू होती है। जब कोई व्यक्ति आत्म-मंथन और गहरे ध्यान की अवस्था से गुज़रता है, तो उसके भीतर जमे हुए क्रोध, लोभ, मोह और चिंता के विकार धुलने लगते हैं। ध्यान वह आत्मिक स्नान है जो केवल त्वचा को नहीं, बल्कि चेतना को धो देता है। तभी तो जब वह व्यक्ति बाहर आता है, तो उसे देखकर लोग विस्मित होकर कहते हैं—‘आप तो आज भी बीस साल पहले जैसे ही लग रहे हैं।’ वे यह नहीं समझ पाते कि वह जवान नहीं हुआ है, बल्कि वह अपनी ‘निर्मलता’ के उस मूल स्वरूप में लौट आया है जहाँ समय के थपेड़ों का कोई निशान नहीं बचा। वह अपनी मौलिकता में सुरक्षित हो गया है।
सफ़ाई जिस्म की कर ली, तो बस मैल उतरा है, मगर जो रूह धो डाली, तो फिर असली रूप उभरा है। वज़न कुछ घट गया होगा, पुराने उन बर्तनों का, मगर जो चमक लौटी है, वो हर नुकसां से गहरा है।।
इसी यात्रा का जो शिखर है, उसे हम ‘शुचिता’ कहते हैं। शुचिता का अर्थ केवल साफ़ होना या चमकदार होना नहीं है; यह तो पवित्रता का वह वरदान है जो किसी वस्तु को पूजनीय बना देता है। वह बर्तन जो रगड़कर निर्मल किया गया था, वह केवल साफ़ था, लेकिन जब उसे पूजा की थाली में सजाया गया या उसमें गंगाजल भरा गया, तब वह ‘शुचि’ बन गया। शुचिता आचरण की वह सुगंध है जो शब्दों और कर्मों के मेल से पैदा होती है। आज का युग ‘मेकअप’ और रसायनों की चमक का युग है, जहाँ वृद्ध भी युवा दिखने का असफल प्रयास कर रहे हैं। किंतु उन्हें यह समझना होगा कि बाहरी लेप से उम्र नहीं छिपती, बल्कि वह शुचिता से निखरती है। यदि मन निर्मल हो और आचरण में शुचिता हो, तो चेहरे पर वह ‘तेज’ आता है जिसे कोई केमिकल कभी पैदा नहीं कर सकता। चमक तो पत्थर में भी हो सकती है, पर तेज केवल जीवित और शुद्ध चेतना में ही होता है।
एक विचारक के रूप में ‘अनपढ़’ के मन में यह सवाल बार-बार कौंधता है कि हम अपनी विरासत, अपने संस्कारों और अपने चरित्र को क्या उसी शिद्दत से ‘मूल रूप’ में सुरक्षित रख पाए हैं, जैसे हम अपनी दस साल पुरानी कार को रखते हैं? कार को नए जैसा दिखाने के लिए हम उसे रगड़ते हैं, उसकी डेंटिंग-पेंटिंग करवाते हैं, क्योंकि हमें उसके बाहरी सौंदर्य से मोह है। क्या हमने कभी अपने विचारों की डेंटिंग-पेंटिंग की है? क्या हमने अपने भीतर जमी नफरत की ‘तूतिया’ को कभी हटाने का प्रयास किया है? जीवन का असली उल्लास पुरानी चीज़ों को ‘नया’ कहने में नहीं, बल्कि उन पुरानी चीज़ों में छिपी ‘मौलिकता’ को पहचान लेने में है। जैसे ही विकार हटते हैं, सत्य प्रकट हो जाता है। और जो सत्य है, वह कभी पुराना नहीं होता; वह सदैव नूतन और चिर-युवा रहता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम दिखावे की सफ़ाई से आगे बढ़कर आत्मिक निर्मलता की ओर कदम बढ़ाएं। हम बर्तनों का वजन कम होने से न डरें, क्योंकि जो जा रहा है वह व्यर्थ का बोझ है, और जो बच रहा है वह शुद्ध सोना है। जब समाज का हर व्यक्ति अपने भीतर की शुचिता को जागृत कर लेगा, तब किसी को यह कहने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी कि ‘आप पुराने लग रहे हैं।’ तब हर व्यक्तित्व वैसा ही महकेगा जैसे सुबह खिला हुआ कोई ताज़ा फूल। जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम अंत तक अपनी उस ‘मूल आभा’ को बचाए रखें जो हमें विधाता ने जन्म के समय सौंपी थी।
तूतिया मन की हटाओ, तो धातु अपनी जागेगी, वक्त की हर एक झुर्रि, रूह के आगे भागेगी। शुचिता वो नूर है ‘अनपढ़’, जो मिटने से नहीं मिटता, तभी तो ये पुरानी चीज़, नई सी नज़र आएगी।
— अखिलेश जोशी “अनपढ़”
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विचारक परिचय:
अखिलेश जोशी ‘अनपढ़’ केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक जीवंत विचारधारा और सूक्ष्म दृष्टि का प्रतिबिंब हैं। इंदौर की माटी से जुड़े और भारतीय नौसेना के अनुशासित परिवेश में पले-बढ़े जोशी जी ने जीवन को धरातल और आकाश, दोनों ऊंचाइयों से देखा है। मौसम विज्ञान और उपग्रह प्रणालियों जैसे तकनीकी क्षेत्रों में वर्षों तक कार्य करने के बावजूद, उनका मन सदैव मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों की खोज में लगा रहा।
‘अनपढ़’ उपनाम उनकी उस सहजता और विनम्रता का प्रतीक है, जो यह मानती है कि जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा किताबी ज्ञान में नहीं, बल्कि प्रकृति और आचरण के शुद्धिकरण में निहित है। एक लेखक और सामाजिक विचारक के रूप में, वे जटिल दार्शनिक विषयों को अत्यंत सरल, बोलचाल की भाषा और मर्मस्पर्शी उदाहरणों के माध्यम से प्रस्तुत करने की कला में माहिर हैं। उनके लेखन में अक्सर अपनी जड़ों की ओर लौटने, संस्कारों की 'शुचिता' बनाए रखने और आधुनिक चकाचौंध के बीच मानवीय मूल्यों के 'संरक्षण' की तड़प दिखाई देती है।
साहित्यिक शुचिता और व्याकरण की शुद्धता के प्रति उनका आग्रह उन्हें समकालीन लेखकों में एक विशिष्ट स्थान देता है। वे मानते हैं कि जिस तरह एक पुराने बर्तन की तूतिया हटाने से उसकी मूल चमक लौट आती है, उसी तरह यदि मनुष्य अपने अहंकार और कुंठाओं की 'घिसाई' कर दे, तो वह अपने मूल और निर्मल स्वरूप को पुनः प्राप्त कर सकता है। आज के इस लेख में उनके द्वारा प्रतिपादित 'सफ़ाई से शुचिता तक' का विमर्श, वास्तव में आत्मिक बोध की ओर ले जाने वाला एक वैचारिक मार्ग है।
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