अंतरद्वंद्व की अनुगूंज
क्यों रुष्ट है,यह भी स्पष्ट नहीं
अपने ही मन से कैसा वैर, ज्ञात नहीं,
अनपढ़ को अपने भावों का बोध नहीं।
क्या हुआ, कब हुआ स्मरण नहीं,
किसने कहा इसका भी ज्ञान नहीं,
निराधार आरोप लिए बैठा है अनपढ़।
मन की चंचल तरंगें उठीं,
स्वयं से ही रुष्ट हो बैठा अनपढ़,
अन्यथा इसका कोई कारण नहीं।
रूप से दूरी बना ली है,
पर स्वभाव पर विश्वास शेष है,
स्नेह में कोई न्यूनता नहीं।
अधरों पर थी केवल शुभकामना,
हृदय की उलझन में वह बदल गई,
कब अभिशाप बनी यह ज्ञात नहीं।
सोचा अब कोई अपना नहीं,
संबंध भी तोड़ दिए अनपढ़ ने,
किन्तु कारण अब तक स्पष्ट नहीं।
अनपढ़ स्वार्थी है, दोषपूर्ण भी,
उसकी वेदना से अनजान है संसार,
उसके मन का कोई साक्षी नहीं।
जीवन और मृत्यु के मध्य खड़ा अनपढ़,
निर्णय अब तक अधूरा है,
न जीवन से अनुराग, न मृत्यु से संबंध।
— अखिलेश जोशी “अनपढ़”
No comments:
Post a Comment