मोरनी को नहीं बख़्शी सुन्दरता
मोरनी को नाच नहीं सिखाया
मोरनी को रंग भी नहीं दिये
हे प्रभु! मोर को ही क्यों चुना?
हाथी को दी मस्तानी चाल
गज़मस्तक मिला गणेशजी को
हाथी को देकर दाँत क़ीमत बढ़ा दी
हे प्रभु! हाथी को ही क्यों चुना?
हिरणी को केवल चाल दी
हिरणी को भोली-सी सीरत दी
कस्तूरी दे डाली हिरण को
हे प्रभु! हिरण को ही क्यों चुना?
नागिन को बना दिया दुबला-पतला
सब के मन में दिया डर नागिन का
नाग को मणि देकर देवत्व दे दिया
हे प्रभु! नाग को ही क्यों चुना ?
नदियों को जल दे दिया
टेढ़े-मेढ़े मार्ग पर ही चलने दिया
सागर को रत्न और मोती दिये
हे प्रभु! सागर को ही मान क्यूँ दिया?
पुरुष को पत्नी से सज्जित कर दिया
हर बात मानने पर विवश कर दिया
तीनों लोकों में वरदानों से
हे प्रभु! पुरुष को क्यूँ वंचित किया?
क्षमा करना मैं भूल गया
जो मेरी हालत है उसके मुक़ाबले
तेरी क्या हालत होगी तूने तो
सौलह हज़ार को वरण किया!
हे प्रभु! स्वयं को ही क्यों चुना?
-अखिलेश जोशी ‘अनपढ़
(कवि का सीधा सा अर्थ यह है कि विधाता ने पुरुष को दुनिया जीतने की ताकत और वरदान तो दिए, लेकिन गृहस्थ जीवन में कदम रखते ही उसे एक ऐसी 'सुप्रीम पावर' (पत्नी) के अधीन कर दिया कि उसके सारे वरदान और शक्तियाँ धरी की धरी रह गईं।)
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